ड्रोन तकनीक को नई दिशा देगा चमगादड के उडान का तरीका

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लंदन । वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से सवाल बना हुआ था कि पिच-ब्लैक अंधेरे में चमगादड़ इतनी सटीकता से रास्ता कैसे पहचान लेते हैं। घने जंगल, चारों तरफ घुप्प अंधेरा और तेज रफ्तार उड़ान, इसके बावजूद चमगादड़ कभी पेड़ों, पत्तियों या टहनियों से नहीं टकराते। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के वैज्ञानिकों ने इस रहस्य से पर्दा उठा दिया है। यह खोज न केवल प्रकृति की अद्भुत क्षमता को सामने लाती है, बल्कि भविष्य की ड्रोन और रोबोटिक तकनीक को भी नई दिशा दे सकती है। अब तक माना जाता था कि चमगादड़ पूरी तरह इको-लोकेशन यानी ध्वनि तरंगों के सहारे उड़ान भरते हैं और आसपास मौजूद हर चीज को सोनार की तरह मैप करते हैं। लेकिन नई स्टडी के मुताबिक, चमगादड़ सिर्फ आवाज़ की गूंज पर निर्भर नहीं रहते। वे ध्वनि के प्रवाह और उसकी गति को भी महसूस करते हैं, जिसे वैज्ञानिकों ने “अकूस्टिक फ्लो वेलोसिटी” नाम दिया है। इसका मतलब यह हुआ कि चमगादड़ हर पत्ती या टहनी की अलग-अलग दूरी नहीं मापते, बल्कि ध्वनि के बहाव के पैटर्न से यह समझ लेते हैं कि सामने का वातावरण कितना घना है और किस रफ्तार से आगे बढ़ना सुरक्षित रहेगा।
इस सिद्धांत को साबित करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक खास प्रयोग किया, जिसे “बैट एक्सेलेरेटर मशीन” नाम दिया गया। यह करीब आठ मीटर लंबा एक उड़ान कॉरिडोर था, जिसमें लगभग 8,000 कृत्रिम पत्तियां लगाकर घने जंगल जैसा माहौल तैयार किया गया। इस प्रयोग में 100 से ज्यादा पिपिस्ट्रेल प्रजाति के चमगादड़ों की उड़ान को बारीकी से ट्रैक किया गया। वैज्ञानिकों ने इन नकली पत्तियों को आगे-पीछे खिसकाया, जिससे ध्वनि तरंगों के प्रवाह की गति बदलती रही। जब पत्तियां चमगादड़ों की ओर बढ़ाईं गईं और उन्हें ध्वनि का प्रवाह तेज महसूस हुआ, तो उन्होंने अपनी उड़ान की रफ्तार लगभग 28 प्रतिशत तक कम कर ली।
वहीं, जब पत्तियां पीछे हटाईं गईं और ध्वनि प्रवाह धीमा लगा, तो चमगादड़ों ने अपनी स्पीड बढ़ा दी। इससे यह साफ हुआ कि चमगादड़ वातावरण की गति को समझकर अपने उड़ान नियंत्रण को तुरंत बदल लेते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रक्रिया डॉप्लर शिफ्ट के सिद्धांत पर आधारित है, वही सिद्धांत जिसकी वजह से एंबुलेंस के पास आने और दूर जाने पर सायरन की आवाज़ बदलती हुई महसूस होती है। यानी चमगादड़ सिर्फ “आवाज़ से देख” नहीं रहे होते, बल्कि वे आसपास की गति और बनावट को महसूस कर रहे होते हैं। इस खोज को ड्रोन और रोबोटिक्स की दुनिया में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

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