ढाका। बांग्लादेश की राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया है। अवामी लीग के वरिष्ठ नेता, हिंदू समुदाय के प्रमुख चेहरे और पूर्व जल संसाधन मंत्री रमेश चंद्र सेन की शनिवार को हिरासत में मौत हो गई। 85 वर्षीय सेन लंबे समय से बीमार चल रहे थे और दीनाजपुर जिला जेल में बंद थे। शनिवार सुबह उन्हें जेल से दीनाजपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल के इमरजेंसी विभाग लाया गया, जहां कुछ ही मिनटों बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
जेल प्रशासन के अनुसार, रमेश चंद्र सेन को सुबह करीब 9:10 बजे अस्पताल लाया गया था और 9:29 बजे डॉक्टरों ने उनकी मृत्यु की पुष्टि की। हालांकि, उनकी मौत के बाद कस्टोडियल डेथ को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विपक्षी दलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे सिर्फ बीमारी से हुई मौत मानने से इनकार किया है।
गौरतलब है कि रमेश चंद्र सेन बांग्लादेश की राजनीति में एक प्रभावशाली नाम थे। वे पांच बार सांसद चुने गए और शेख हसीना सरकार में जल संसाधन मंत्री रह चुके थे। उन्होंने 2024 के आखिरी आम चुनाव में भी जीत दर्ज की थी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शेख हसीना सरकार के पतन के बाद अवामी लीग नेताओं के खिलाफ जिस तरह से मामले दर्ज किए गए, उनमें राजनीतिक बदले की भावना साफ नजर आती है। सेन के खिलाफ भी हाल के महीनों में हत्या समेत तीन मामले दर्ज किए गए थे, जिन्हें कई विश्लेषक “घोस्ट केस” करार दे रहे हैं।
सूत्रों का दावा है कि हिरासत के दौरान रमेश चंद्र सेन को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं दी गई। अगस्त 2024 में उनकी गिरफ्तारी के समय सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें वायरल हुई थीं, जिनमें उनके हाथ रस्सियों से बंधे हुए दिखे थे। उस वक्त भी उनकी उम्र और स्वास्थ्य को लेकर सवाल उठे थे। कई अवामी लीग नेता देश छोड़कर चले गए थे, लेकिन सेन अपने घर पर ही रुके रहे। उनका कहना था कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया और उन्हें न्याय व्यवस्था पर भरोसा है।
उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई यूजर्स ने इसे “प्रिजन मर्डर” और “कस्टोडियल किलिंग” बताया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हिरासत में बीमारी के दौरान मरने वाले अवामी लीग नेताओं की संख्या अब कम से कम पांच हो चुकी है।
रमेश चंद्र सेन का राजनीतिक कद इस बात से भी समझा जा सकता है कि उन्होंने विपक्ष के बड़े नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगिर को चुनाव में हराया था। उनकी मौत ने बांग्लादेश में मानवाधिकार, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिशोध को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है।
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