वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी नौसेना ने अपने सबसे ताकतवर निमित्ज़-क्लास सुपरकैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन (सीवीएन-72) को मिडिल ईस्ट रवाना कर दिया है। यह युद्धपोत दक्षिण चीन सागर में तैनात था, लेकिन पेंटागन ने हालात को देखते हुए इसके कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को ईरान के करीब तैनात करने का फैसला किया है। सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह ग्रुप अकेले ही किसी मध्यम आकार की सेना के बराबर मारक क्षमता रखता है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यूएसएस अब्राहम लिंकन (सीएसजी-3) का फ्लैगशिप है। यह सिर्फ एक जहाज नहीं, बल्कि चलता-फिरता एयरबेस और कमांड सेंटर है। इस ग्रुप में कैरियर के अलावा 3 से 4 अत्याधुनिक गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर, 1 से 2 न्यूक्लियर अटैक सबमरीन, और सप्लाई व फ्यूल सपोर्ट जहाज शामिल होते हैं। जरूरत पड़ने पर यह समूह महीनों तक समुद्र में रहकर युद्ध कर सकता है। करीब एक लाख टन वजनी यूएसएस अब्राहम लिंकन न्यूक्लियर-पावर्ड है यानी इसे ईंधन भरने की जरूरत कम पड़ती है। अकेले इस कैरियर पर करीब 5,000 से 6,000 सैनिक और एयरक्रू तैनात रहते हैं, जबकि पूरे स्ट्राइक ग्रुप में यह संख्या 7,000 से 8,000 तक पहुंच जाती है।
इस सुपरकैरियर पर तैनात (सीवीडब्ल्यू-9) इसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसमें करीब 65 से 70 लड़ाकू और सपोर्ट विमान शामिल हैं। इनमें एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉर्नेट, अत्याधुनिक स्टील्थ फाइटर एफ-35सी लाइटनिंग-2, ईए-18जी ग्राउलर, ई-2डी हॉकआई और एमएच-60 सीहॉक हेलीकॉप्टर शामिल हैं। ये विमान दिन-रात उड़ान भरकर हमला, निगरानी और रक्षा तीनों काम कर सकते हैं।
इस ग्रुप के पास सैकड़ों टोमाहॉक क्रूज मिसाइलें हैं, जिन्हें डिस्ट्रॉयर और सबमरीन से दागा जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक पूरा ग्रुप एक साथ 500 से 1000 से ज्यादा टोमाहॉक मिसाइलें लॉन्च करने में सक्षम है। इसके अलावा एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड मिसाइलें, स्मार्ट बम और एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम इसे अभेद्य बनाते हैं जिन्हें भेदा नहीं जा सकता। अगर ईरान के साथ सीधी जंग होती है, तो यह ग्रुप ईरान के एयरबेस, मिसाइल ठिकानों, नौसैनिक अड्डों और रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइलें, ड्रोन और प्रॉक्सी मिलिशिया हैं, जो संघर्ष को लंबा और खतरनाक बना सकती हैं। फिलहाल अमेरिका का संदेश साफ है- यूएसएस अब्राहम लिंकन की तैनाती सिर्फ युद्ध के लिए नहीं, बल्कि ईरान को रोकने और क्षेत्र में अमेरिकी व सहयोगी हितों की रक्षा के लिए है।
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