पाकिस्तान की शहबाज शरीफ ने सरकारी खर्चों में कटौती की, मंत्रियों की सैलरी बंद

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इस्लामाबाद।पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोमवार को जब राष्ट्र के नाम अपना संबोधन शुरू किया, तो आर्थिक तंगी से जूझ रही जनता को राहत की उम्मीद थी, लेकिन इसके उलट सरकार ने आफत का नया फरमान सुना दिया। पश्चिम एशिया में जारी ईरान-इजरायल युद्ध को ढाल बनाकर पाकिस्तान सरकार ने देश में बेहद कड़े और दमनकारी आर्थिक कदम लागू कर दिए हैं। मंत्रियों का वेतन पूरी तरह बंद कर दिया गया है और सांसदों के वेतन में 50 प्रतिशत की भारी कटौती की गई है। इतना ही नहीं, सरकारी अधिकारियों को मिलने वाला पेट्रोल-डीजल कोटा खत्म कर दिया गया है और स्कूल-कॉलेजों को वर्क फ्रॉम होम यानी ऑनलाइन मोड पर शिफ्ट कर दिया गया है।
देखने में ये कदम ईंधन बचाने की एक कवायद लग सकते हैं, लेकिन हकीकत में यह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से अगली किस्त हासिल करने का एक गुप्त रास्ता है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से वेंटिलेटर पर है और आईएमएफ ने फंड देने के लिए जो शर्तें रखी थीं, वे किसी फांसी के फंदे से कम नहीं थीं। इन शर्तों में सरकारी खर्चों में भारी कटौती, सब्सिडी का खात्मा और राजकोषीय घाटे को कम करना अनिवार्य था। शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर की सरकार इन शर्तों को सीधे लागू करने से डर रही थी क्योंकि जनता के विद्रोह का खतरा था। अब युद्ध और वैश्विक संकट का नाम देकर इन कठोर फैसलों को राष्ट्रीय सुरक्षा की चादर में लपेटकर पेश किया जा रहा है। सरकार ने सरकारी विभागों के खर्चों में 20 प्रतिशत की कटौती की है और नई गाड़ियों, फर्नीचर व एसी की खरीद पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। दफ्तरों को हफ्ते में केवल चार दिन कर दिया गया है और 50 प्रतिशत कर्मचारियों को घर से काम करने का निर्देश दिया गया है। जानकारों का मानना है कि मंत्रियों और सांसदों के वेतन में कटौती महज एक दिखावा है ताकि आम जनता के गुस्से को शांत किया जा सके। असल चोट उस मध्यम वर्ग पर पड़ी है जिसके लिए अब बिजली और ईंधन विलासिता की वस्तु बन गए हैं। सरकारी गाड़ियों के बेड़े को 60 प्रतिशत तक कम करना और बड़े अधिकारियों के वेतन से कटौती करना आईएमएफ की उन प्राथमिक शर्तों का हिस्सा है जिन पर वह बार-बार उंगली उठाता रहा है। पाकिस्तान ने इस वैश्विक तनाव का चतुराई से इस्तेमाल अपनी आर्थिक नाकामी को छिपाने के लिए किया है। हकीकत यह है कि मुल्क को डिफॉल्ट होने से बचाने के लिए शहबाज सरकार ने देश को एक ऐसे लालटेन युग में धकेल दिया है, जहां आर्थिक पहिए थम गए हैं और भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है।

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