ढाका। बांग्लादेश में आम चुनाव नजदीक आते ही भारत-विरोधी बयानबाजी तेज हो गई है। इस बीच बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के एक नेता के बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। बीएनपी नेता ने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान बंगाली बुद्धिजीवियों के नरसंहार के लिए पाकिस्तानी सेना की बजाय भारत की ओर इशारा किया है। इस बयान को न केवल ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ माना जा रहा है, बल्कि इसे भारत-विरोधी राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि ऐसे नेता पाकिस्तान से हमदर्दी रखते हैं जो भारत का विरोध कर रहे हैं।
बीएनपी की नारायणगंज शहर इकाई के सदस्य सचिव एडवोकेट अबू अल यूसुफ खान टिपू ने रविवार को शहीद बुद्धिजीवी दिवस के अवसर पर जिला प्रशासन द्वारा आयोजित एक चर्चा कार्यक्रम में कहा कि 1971 में बंगाली बुद्धिजीवियों की सामूहिक हत्या पाकिस्तानी सेना ने नहीं, बल्कि एक पड़ोसी देश की सेना ने की थी। उनका यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से भारत की ओर इशारा करता माना गया। टिपू के बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी आलोचना हुई, जिसके बाद बीएनपी ने औपचारिक रूप से खुद को इस बयान से अलग कर लिया।
गौरतलब है कि यह बयान 16 दिसंबर को मनाए जाने वाले विजय दिवस से ठीक एक दिन पहले आया है। विजय दिवस वह दिन है जब 1971 में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया था और बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। भारत में भी इसे विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसे संवेदनशील मौके पर दिए गए इस बयान ने माहौल को और गरमा दिया है। टिपू ने अपने बयान में जमात-ए-इस्लामी को भी पश्चिमी पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों में मिलीभगत के आरोप से बरी करने की कोशिश की और कहा कि किसी एक राजनीतिक समूह को दोषी ठहराना इतिहास का विकृतिकरण है। उन्होंने जमात से अंतरिम सरकार पर इतिहास को सही करने का दबाव बनाने का आग्रह भी किया। इससे पहले इसी कार्यक्रम में जमात के नेता गुलाम पोरवार ने भी दावा किया था कि बुद्धिजीवियों की हत्या भारतीय सेना और उसकी खुफिया एजेंसी की सुनियोजित साजिश थी।
इसी कड़ी में नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) के दक्षिण क्षेत्र के प्रमुख संयोजक हसनत अब्दुल्ला ने भी भारत के खिलाफ तीखा जहर उगला। उन्होंने धमकी भरे लहजे में कहा कि यदि बांग्लादेश को अस्थिर करने की कोशिश हुई तो उसका असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचेगा। उन्होंने भारत पर सीमा हत्याओं और बांग्लादेश की राजनीति में दखल देने के बेबुनियाद आरोप लगाए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शेख हसीना की सरकार के पतन और नई सत्ता व्यवस्था के बाद भारत-विरोधी बयान चुनावी रणनीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। चुनाव से पहले राष्ट्रवाद और बाहरी दुश्मन का मुद्दा उछालकर जनता को प्रभावित करने की कोशिश साफ नजर आ रही है, जिससे भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी असर पड़ सकता है।
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