भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई ऐसे पल आए हैं जब खिलाड़ियों को अपने निजी जीवन और देश के बीच कठिन चुनाव करना पड़ा। कुछ ने अंतिम संस्कार के लिए घर लौटकर फिर मैदान संभाला, तो कुछ ने दिल पर पत्थर रखकर देश के लिए खेलना जारी रखा। इन घटनाओं में सिर्फ क्रिकेट नहीं, बल्कि कर्तव्य, त्याग और भावनाओं की गहराई झलकती है।
रिंकू सिंह: शोक के बीच जिम्मेदारी
हाल ही में रिंकू सिंह के पिता खानचंद सिंह का निधन हो गया। वह लिवर कैंसर से जूझ रहे थे। पिता के अंतिम दर्शन के लिए रिंकू अलीगढ़ पहुंचे, जहां उन्होंने नम आंखों से उन्हें विदाई दी। ऐसे कठिन समय में उनका वेस्टइंडीज के खिलाफ मुकाबले में खेलना संदिग्ध माना जा रहा था, लेकिन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के सचिव देवजीत सैकिया ने स्पष्ट किया कि रिंकू शनिवार को कोलकाता में टीम से जुड़ेंगे।यह फैसला बताता है कि एक बेटा अपने पिता को अंतिम विदाई देने के बाद भी अपने पेशेवर दायित्व से पीछे नहीं हटता। रिंकू के संघर्षों में उनके पिता की अहम भूमिका रही थी। अब उसी सपने को आगे बढ़ाना उनके लिए पुत्र धर्म के साथ-साथ राष्ट्र धर्म भी है।
विराट कोहली: 18 साल की उम्र में असाधारण निर्णय
आज दुनिया के महान बल्लेबाजों में शुमार विराट कोहली के जीवन में 18 दिसंबर 2006 की रात हमेशा के लिए दर्ज है। रणजी ट्रॉफी में दिल्ली बनाम कर्नाटक मुकाबले के दौरान उनके 54 वर्षीय पिता प्रेम कोहली का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उस वक्त 18 वर्षीय विराट 40 रन बनाकर नाबाद थे और दिल्ली को फॉलोऑन से बचाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी।कोच और साथियों ने उन्हें घर जाने की सलाह दी, लेकिन विराट ने फैसला किया कि वह पहले टीम को संकट से उबारेंगे। अगले दिन उन्होंने 90 रनों की जुझारू पारी खेली, टीम को फॉलोऑन से बचाया और फिर सीधे अंतिम संस्कार के लिए रवाना हो गए। उस दिन एक युवा खिलाड़ी ने अपने दुख को दिल में दबाकर देश और टीम के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई। यही घटना उन्हें मानसिक रूप से परिपक्व बना गई और आगे चलकर वही लड़का भारतीय क्रिकेट की धड़कन बन गया।
मोहम्मद सिराज: पिता का सपना, देश की ड्यूटी
मोहम्मद सिराज की कहानी संघर्ष और समर्पण की मिसाल है। उनके पिता मोहम्मद गौस एक ऑटो चालक थे, जिन्होंने कठिन हालात में भी बेटे के सपनों को जिंदा रखा। साल 2020 में जब भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया दौरे पर थी, तभी उनके पिता का निधन हो गया। पृथकवास (क्वारंटीन) नियमों के कारण सिराज भारत लौटकर अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके।भावुक सिराज ने कहा था कि उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा सहारा खो दिया, लेकिन उनके पिता का सपना था कि वह देश के लिए खेलें। सिराज ने उसी सपने को अपना संबल बनाया और ऑस्ट्रेलिया की धरती पर शानदार प्रदर्शन कर टीम इंडिया को ऐतिहासिक जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई। यह त्याग केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि उस भावना का प्रतीक था जिसमें देश पहले आता है और निजी दुख बाद में।
सचिन तेंदुलकर: शतक जो पिता को समर्पित था
1999 विश्व कप के दौरान सचिन तेंदुलकर के पिता रमेश तेंदुलकर का निधन हो गया था। वह उस समय इंग्लैंड में थे। सूचना मिलते ही वह भारत लौटे, अंतिम संस्कार में शामिल हुए और फिर टीम के साथ जुड़ गए। कीनिया के खिलाफ मैच में उन्होंने शतक जड़ा। शतक पूरा करते ही उन्होंने आसमान की ओर देखा मानो पिता को यह उपलब्धि समर्पित कर रहे हों। वह पारी सिर्फ एक शतक नहीं थी, बल्कि एक बेटे की पिता को श्रद्धांजलि थी।ये घटनाएं बताती हैं कि भारतीय क्रिकेटर सिर्फ खिलाड़ी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और त्याग की मिसाल हैं। उन्होंने यह साबित किया कि पुत्र धर्म और राष्ट्र धर्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को पूर्ण करने वाले हैं।
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