इस्लामाबाद। पाकिस्तान की बदहाल आर्थिक स्थिति और विदेशी कर्ज के बोझ तले दबी उसकी साख की हकीकत अब खुद देश के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दुनिया के सामने रख दी है। दशकों से चली आ रही कर्ज की इस प्रेम कहानी पर कटाक्ष करते हुए प्रधानमंत्री शरीफ ने स्वीकार किया कि कैसे उन्हें और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को दूसरे देशों के सामने कर्ज के लिए गिड़गिड़ाना पड़ता है। सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने एक हालिया संबोधन में शरीफ ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से बेलआउट पैकेज हासिल करने के लिए उन्हें किस हद तक शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा।
इस्लामाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने देश की जनता के साथ अपनी बेबसी साझा की। उन्होंने कहा कि भले ही पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति में थोड़ा सुधार दिख रहा हो, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई बहुत कड़वी है। शरीफ के मुताबिक, मैं उन देशों का आभारी हूं जिन्होंने संकट में हमारा साथ दिया, लेकिन कर्ज लेने की अपनी मर्यादाएं और जिम्मेदारियां होती हैं। मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता कि हमने दोस्त देशों से कर्ज मांगने के लिए कितनी मशक्कत की। मैं और सेना प्रमुख ने मिलकर चुपचाप कई देशों का दौरा किया, उन्हें पाकिस्तान के हालात और आईएमएफ प्रोग्राम की अहमियत समझाई और फिर कई अरब डॉलर की मांग की।
प्रधानमंत्री ने आत्मग्लानी के भाव के साथ स्वीकार किया कि जब कोई व्यक्ति या देश कर्ज लेने जाता है, तो उसका सिर हमेशा झुका होता है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि कर्ज मुफ्त में नहीं मिलता; मदद करने वाले देशों की अपनी शर्तें और मांगें होती हैं, जिन्हें अपनी इज्जत दांव पर लगाकर भी मानना पड़ता है। शरीफ का यह बयान ऐसे समय में आया है जब चर्चाएं हैं कि पाकिस्तान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पीस बोर्ड का हिस्सा बनने के लिए हामी भर चुका है, जिसमें शामिल होने की अपनी भारी-भरकम वित्तीय शर्तें हैं।संकट के समय मददगार रहे देशों का आभार जताते हुए शहबाज शरीफ ने विशेष रूप से चीन का नाम लिया। उन्होंने कहा कि चीन ने सबसे कठिन दौर में पाकिस्तान का हाथ थामा। इसके अलावा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर के वित्तीय सहयोग के बिना आईएमएफ का कार्यक्रम तैयार करना मुमकिन नहीं था।
आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीएवा के साथ अपनी मुलाकात को याद करते हुए शरीफ ने बताया कि पिछली गलतियों के कारण आईएमएफ पाकिस्तान को और रियायत देने के मूड में नहीं था। उन्होंने कहा, जॉर्जीएवा ने साफ कह दिया था कि अब समय खत्म हो चुका है। तब मैंने उन्हें अपनी इज्जत की कसम दी और भरोसा दिलाया कि हम समझौते की हर शर्त का अक्षरशः पालन करेंगे। इसी भावनात्मक अपील और कड़े वादों के बाद ही पाकिस्तान को वह कर्ज मिल सका, जिसने उसे दिवालिया (डिफॉल्ट) होने की कगार से वापस खींचा।
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